TKDL भारत का डिजिटल शील्ड: पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा TKDL भारत का डिजिटल शील्डः पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा कैसे की गई [विज्ञापन प्लेसमेंट: यहाँ अपना Ad Code डालें] समस्या क्या थीः पश्चिमी पेटेंट अधिकारी संस्कृत/तामिल/फारसी नहीं पढ़ सकते थे अंतरराष्ट्रीय पेटेंट व्यवस्था का एक मूलभूत नियम है: पेटेंट केवल उसी आविष्कार को प्रदान किया जा सकता है जो 'नया' हो और जिसका पूर्व में साहित्य या सार्वजनिक डोमेन में कोई उल्लेख (Prior Art) न हो। मुख्य समस्या यह थी कि USPTO (अमेरिका) या EPO (यूरोप) के पेटेंट परीक्षक 'प्रायर आर्ट' खोजने के लिए केवल पश्चिमी भाषाओं और उनके अपने डिजिटल डेटाबेस का उपयोग करते थे। उनके पास महर्षि चरक, सुश्रुत, वाग्भट के ग्रंथों या तमिल के प्राचीन सिद्ध साहित्यों को पढ़ने, समझने या खोजने की कोई क्षमता नहीं थी। इस भाषाई अवरोध (Language Barrier) का अनुचित लाभ उठाकर विदेशी कंपनियाँ आसानी से भारतीय जड़ी-बूटियों पर पेटेंट हासिल कर रही थीं, क्योंकि परीक्षकों के पास यह प्रमाणित करने का कोई ...
बासमती और हल्दी पेटेंट युद्ध: भारत की बड़ी बौद्धिक जीत बासमती और हल्दी पेटेंट युद्धः भारत की सबसे बड़ी बौद्धिक संपदा लड़ाई 1990 के दशक में भारत की स्थितिः आर्थिक उदारीकरण और नए खतरे [span_0](start_span) 1990 का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक संक्रमण काल था[span_0](end_span)। [span_1](start_span)1991 में अपने बाजारों को खोलने के बाद, भारत ने विदेशी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वागत किया[span_1](end_span)। [span_2](start_span)हालांकि, इस आर्थिक उदारीकरण के साथ-साथ कई अप्रत्याशित और अदृश्य खतरे भी देश में प्रवेश कर रहे थे[span_2](end_span)। [span_3](start_span)वैश्वीकरण (Globalization) के इस दौर में, विश्व व्यापार संगठन (WTO) का उदय हुआ और TRIPS (Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights) समझौते ने पेटेंट कानूनों को वैश्विक रूप से मानकीकृत कर दिया[span_3](end_span)। [span_4](start_span)विकसित देशों की विशाल फार्मास्युटिकल और कृषि कंपनियों ने अपनी सुदृढ़ कानूनी और वित्तीय ताकत का उपयोग करते हुए उन औषध...