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बासमती और हल्दी पेटेंट युद्धः भारत की सबसे बड़ी बौद्धिक संपदा लड़ाई

बासमती और हल्दी पेटेंट युद्ध: भारत की बड़ी बौद्धिक जीत

बासमती और हल्दी पेटेंट युद्धः भारत की सबसे बड़ी बौद्धिक संपदा लड़ाई

1990 के दशक में भारत की स्थितिः आर्थिक उदारीकरण और नए खतरे

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1990 का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक संक्रमण काल था[span_0](end_span)। [span_1](start_span)1991 में अपने बाजारों को खोलने के बाद, भारत ने विदेशी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वागत किया[span_1](end_span)। [span_2](start_span)हालांकि, इस आर्थिक उदारीकरण के साथ-साथ कई अप्रत्याशित और अदृश्य खतरे भी देश में प्रवेश कर रहे थे[span_2](end_span)। [span_3](start_span)वैश्वीकरण (Globalization) के इस दौर में, विश्व व्यापार संगठन (WTO) का उदय हुआ और TRIPS (Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights) समझौते ने पेटेंट कानूनों को वैश्विक रूप से मानकीकृत कर दिया[span_3](end_span)। [span_4](start_span)विकसित देशों की विशाल फार्मास्युटिकल और कृषि कंपनियों ने अपनी सुदृढ़ कानूनी और वित्तीय ताकत का उपयोग करते हुए उन औषधीय पौधों, बीजों और जैविक संसाधनों पर पेटेंट फाइल करना शुरू किया, जो तीसरी दुनिया के देशों की साझा संपत्ति और सामुदायिक ज्ञान का हिस्सा थे[span_4](end_span)। [span_5](start_span)बौद्धिक संपदा कानूनों की इस नई और आक्रामक वैश्विक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में, भारत की जैव-विविधता और पारंपरिक संपदा अत्यंत असुरक्षित हो गई थी[span_5](end_span)। [span_6](start_span)यह एक ऐसा युद्ध था जो तोपों से नहीं, बल्कि वकीलों और पेटेंट कार्यालयों के वातानुकूलित कमरों में लड़ा जा रहा था[span_6](end_span)。

बासमती चावल पर अमेरिकी पेटेंट: भौगोलिक संकेत (GI) की चोरी का प्रयास

राइसटेक इंक. [span_7](start_span)द्वारा 1997 में बासमती चावल की प्रजातियों पर पेटेंट (नंबर 5,663,484) हासिल करना सीधे तौर पर भारत के 'भौगोलिक संकेत' (Geographical Indication - GI) की डकैती का एक संस्थागत प्रयास था[span_7](end_span)। बासमती कोई प्रयोगशाला का उत्पाद नहीं है; [span_8](start_span)यह भारत और पाकिस्तान के हिमालयी तराई क्षेत्रों की विशिष्ट जलवायु, अद्वितीय मिट्टी (Terroir) और सदियों से चली आ रही पारंपरिक कृषि पद्धतियों का परिणाम है[span_8](end_span)। [span_9](start_span)इसका लंबा दाना, पकाने पर दोगुना हो जाना और इसकी अद्भुत सुगंध इसकी पहचान है[span_9](end_span)। [span_10](start_span)राइसटेक ने चालाकी से अपने पेटेंट दावों में "बासमती" शब्द का प्रयोग कर उत्तरी अमेरिका और यूरोप में बासमती के पूरे बाजार पर एकाधिकार जमाने का प्रयास किया, जिससे भारत का 600,000 टन का निर्यात बाजार खतरे में आ गया[span_10](end_span)। [span_11](start_span)इस घटना ने भारत सरकार और नीति निर्माताओं को GI संरक्षण के महत्व के प्रति गहरे रूप से जागरूक किया[span_11](end_span)। [span_12](start_span)बासमती विवाद के प्रत्यक्ष और दूरगामी परिणाम स्वरूप ही भारत की संसद ने 'माल का भौगोलिक उपदर्शन (रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999' (Geographical Indications of Goods Act, 1999) पारित किया[span_12](end_span)। [span_13](start_span)इस कानूनी सुधार ने यह सुनिश्चित किया कि भविष्य में दार्जिलिंग चाय, कांचीपुरम सिल्क या कोल्हापुरी चप्पल जैसे भारतीय भौगोलिक मूल के उत्पादों की पहचान को विदेशी कंपनियों द्वारा हड़पा न जा सके[span_13](end_span)。

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हल्दी पर मिसिसिपी विश्वविद्यालय का पेटेंटः प्राचीन आयुर्वेद को नया आविष्कार बताना

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मिसिसिपी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं (सुमन के. दास और हरि हर पी. कोहली) द्वारा दिसंबर 1993 में हल्दी (Curcuma longa) पर पेटेंट का दावा इस बात पर केंद्रित था कि हल्दी के उपयोग से घावों, सर्जिकल कट और अल्सर को प्रभावी ढंग से भरा जा सकता है[span_14](end_span)। [span_15](start_span)मार्च 1995 में प्राप्त इस पेटेंट (नंबर 5,401,504) के दावों में हल्दी के पाउडर के मौखिक (Oral) और सामयिक (Topical) प्रशासन दोनों का स्पष्ट उल्लेख था[span_15](end_span)। [span_16](start_span)पश्चिमी पेटेंट परीक्षकों के लिए, जो केवल अंग्रेजी भाषा के आधुनिक शोध पत्रों पर निर्भर थे, यह एक "नवीन" (Novel) खोज थी क्योंकि उनके डेटाबेस में ऐसा कोई पूर्व साहित्य उपलब्ध नहीं था जो इस बात की पुष्टि कर सके कि हल्दी का यह उपयोग सार्वजनिक ज्ञान है[span_16](end_span)। [span_17](start_span)यह मामला पश्चिमी पेटेंट प्रणाली की एक गंभीर प्रणालीगत खामी को उजागर करता था, जहाँ अलिखित या केवल स्थानीय भाषाओं (जैसे संस्कृत, हिंदी, उर्दू) में मौजूद पारंपरिक ज्ञान को पूरी तरह से नजरअंदाज या अमान्य माना जाता था[span_17](end_span)। [span_18](start_span)इस खामी ने प्राचीन भारतीय आयुर्वेद को एक विदेशी आविष्कार में बदल दिया था[span_18](end_span)。

मसहेलकर की रणनीतिः कानूनी लड़ाई वैज्ञानिक प्रमाण + प्राचीन साक्ष्य

डॉ. [span_19](start_span)मसहेलकर ने इस संकट का विश्लेषण करते हुए यह महसूस किया कि केवल कूटनीतिक विरोध या भावनात्मक राष्ट्रवाद से यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती[span_19](end_span)। [span_20](start_span)इस युद्ध को पश्चिमी पेटेंट व्यवस्था के ही कठोर नियमों और उनके ही मैदान में लड़ना होगा[span_20](end_span)। उनकी त्रिस्तरीय रणनीति (Tripartite Strategy) इस प्रकार थीः

    [span_21](start_span)
  1. प्राचीन साक्ष्यों का प्रलेखन (Documentation of Ancient Texts): CSIR की टीम ने पूरे भारत के पुस्तकालयों, आयुर्वेदिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों से संपर्क किया[span_21](end_span)। [span_22](start_span)उन्होंने संस्कृत के श्लोकों, उर्दू और हिंदी के प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों को खोजा और उनके प्रमाणित अंग्रेजी अनुवाद तैयार कराए[span_22](end_span)। [span_23](start_span)हल्दी के मामले में 32 प्राचीन संदर्भों का एक विशाल दस्तावेज़ तैयार किया गया[span_23](end_span)।
  2. वैज्ञानिक प्रमाण (Scientific Validation): चूंकि पश्चिमी पेटेंट कार्यालय वैज्ञानिक पत्रिकाओं को अधिक महत्व देते हैं, डॉ. [span_24](start_span)मसहेलकर ने 1953 के 'जर्नल ऑफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन' में प्रकाशित एक शोध पत्र को प्रस्तुत कर यह स्थापित किया कि हल्दी के गुण वैज्ञानिक रूप से भी पूर्व में प्रकाशित (Prior Art) हैं[span_24](end_span)।
  3. [span_25](start_span)
  4. आनुवंशिक और जीनोमिक विश्लेषण (Genetic Fingerprinting): बासमती के मामले में, ऐतिहासिक दावों के साथ-साथ आधुनिक जीनोमिक्स का सहारा लिया गया[span_25](end_span)। [span_26](start_span)यूरोफिन्स (Eurofins) प्रयोगशालाओं और यूके कोड ऑफ प्रैक्टिस (UK COP) के तहत विकसित डीएनए फिंगरप्रिंटिंग विधियों का उपयोग किया गया[span_26](end_span)। [span_27](start_span)15-SSR (Simple Sequence Repeats) मार्कर्स और 'fgr' जीन (जो सुगंध के लिए जिम्मेदार है) के विश्लेषण से यह अकाट्य रूप से साबित किया गया कि राइसटेक का चावल आनुवंशिक रूप से प्रामाणिक बासमती से भिन्न है और यह कोई नवीन आविष्कार नहीं है[span_27](end_span)।
[span_28](start_span) [span_30](start_span)
पेटेंट विवाद का विषय दावा करने वाली संस्था / देश पेटेंट नंबर / ग्रांट वर्ष भारत की रणनीति एवं प्रस्तुत साक्ष्य अंतिम परिणाम
हल्दी (Turmeric) मिसिसिपी विश्वविद्यालय, अमेरिका 5,401,504 (मार्च 1995)32 प्राचीन संस्कृत/उर्दू/हिंदी ग्रंथ, 1953 का IMA वैज्ञानिक शोध पत्र[span_28](end_span) 20 नवंबर 1997 को पेटेंट पूर्णतः रद्द किया गया; [span_29](start_span)दावों को पूर्व कला (Prior Art) माना गया[span_29](end_span)
बासमती चावल (Basmati) राइसटेक इंक. (RiceTec), टेक्सास, अमेरिका 5,663,484 (सितंबर 1997)50,000 पन्नों के साक्ष्य, DNA फिंगरप्रिंटिंग (15-SSR मार्कर्स), GI संरक्षण का तर्क[span_30](end_span) राइसटेक को 20 में से 15 दावे वापस लेने पड़े; [span_31](start_span)'बासमती' नाम पर विदेशी एकाधिकार समाप्त हुआ[span_31](end_span)
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पहली ऐतिहासिक जीतः विकासशील देश के पारंपरिक ज्ञान से अमेरिकी पेटेंट रद्द

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हल्दी पेटेंट का निरस्तीकरण अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा न्यायशास्त्र और उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास में एक जलविभाजक (Watershed) क्षण था[span_32](end_span)। [span_33](start_span)यह इतिहास में पहली बार था जब भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था ने सफलतापूर्वक यह सिद्ध किया कि उनका सदियों पुराना सामुदायिक ज्ञान किसी पश्चिमी प्रयोगशाला का नया आविष्कार नहीं हो सकता[span_33](end_span)। [span_34](start_span)इस जीत ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अन्य विकासशील राष्ट्रों को भी अपने जैविक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा के लिए एक नई उम्मीद और कानूनी दिशा प्रदान की[span_34](end_span)。

TKDL कैसे बना: 5 लाख से ज्यादा फॉर्मूलेशन का डिजिटलीकरण

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इस जीत से प्राप्त आत्मविश्वास और इस अहसास ने कि हर पेटेंट से लड़ना अत्यधिक खर्चीला (लाखों डॉलर) है, TKDL को जन्म दिया[span_35](end_span)। डॉ. [span_36](start_span)मसहेलकर के दूरदर्शी नेतृत्व में वर्ष 2001 में CSIR और आयुष मंत्रालय (ततकालीन ISM&H) के एक अंतर-विषयक कार्यबल (Inter-disciplinary Task Force) ने भारत के प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों को व्यवस्थित रूप से खंगालना शुरू किया[span_36](end_span)। [span_37](start_span)इस भगीरथ प्रयास का परिणाम यह है कि आज इस डिजिटल डेटाबेस में 4.54 लाख (454,000) से अधिक औषधीय और चिकित्सीय फॉर्मूलेशन दर्ज हैं, जिनमें आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, योग और सोवा-रिग्पा की विधियाँ शामिल हैं[span_37](end_span)。

TKDL की भाषाएं: संस्कृत श्लोक से अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, जापानी और स्पेनिश तक

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भारत के पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में सबसे बड़ी बाधा इसकी भाषाई विविधता थी[span_38](end_span)। [span_39](start_span)यह अमूल्य ज्ञान संस्कृत, उर्दू, अरबी, फारसी और तमिल जैसी भाषाओं और पुरानी स्थानीय बोलियों में संहिताबद्ध था[span_39](end_span)। [span_40](start_span)एक अमेरिकी या यूरोपीय पेटेंट परीक्षक के लिए इन लिपियों को पढ़ना असंभव था[span_40](end_span)। [span_41](start_span)TKDL परियोजना ने इस ज्ञान का न केवल तकनीकी अनुवाद किया, बल्कि सूचना प्रौद्योगिकी उपकरणों का उपयोग करते हुए इसे दुनिया की पाँच प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पेटेंट भाषाओं—अंग्रेजी, जापानी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश—में सुलभ कराया[span_41](end_span)। [span_42](start_span)इस कदम ने भाषाई दीवार को पूरी तरह से ढहा दिया[span_42](end_span)。

आज के परिणामः हजारों गलत पेटेंट को रोकने वाली व्यवस्था

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आज, TKDL भारत के लिए एक अभेद्य 'डिजिटल ढाल' की तरह काम कर रहा है[span_43](end_span)। [span_44](start_span)इसके 'ग्लोबल बायोपायरेसी वॉच सिस्टम' (Global Biopiracy Watch System) के जरिए भारतीय वैज्ञानिक और विशेषज्ञ दुनिया भर के प्रमुख पेटेंट कार्यालयों में दाखिल किए गए आवेदनों की निरंतर निगरानी करते हैं[span_44](end_span)। [span_45](start_span)जब भी कोई कंपनी भारतीय जड़ी-बूटियों (जैसे नीम, आंवला, करेला आदि) या चिकित्सा पद्धतियों पर पेटेंट मांगती है, TKDL बिना किसी बड़े कानूनी खर्च (Zero Cost) के पेटेंट परीक्षक को 'प्रायर आर्ट' (Prior Art) का अकाट्य सबूत उनकी ही भाषा में भेज देता है[span_45](end_span)। [span_46](start_span)इस सक्रिय व्यवस्था के कारण अब हजारों गलत पेटेंट प्री-ग्रांट चरण (Pre-grant stage) में ही निरस्त या वापस कर दिए जाते हैं, जिससे भारत की बौद्धिक संपदा सुरक्षित रहती है[span_46](end_span)。

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