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भारत की बौद्धिक संपदा के रक्षक डॉ. आर.ए. मसहेलकर और पारंपरिक ज्ञान की लड़ाई 🛡️📖🌾

डॉ. आर.ए. मसहेलकर: भारतीय पारंपरिक ज्ञान के रक्षक
dr. R. A. Masehlkar

1990 के दशक में भारत पर जैविक उपनिवेशवाद का खतरा

बीसवीं सदी का अंतिम दशक भारत के आर्थिक और कूटनीतिक इतिहास में एक अभूतपूर्व परिवर्तन का साक्षी रहा। वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण (Economic Liberalization) की नीतियों को अपनाने के बाद, भारत ने स्वयं को वैश्विक व्यापार के मुक्त बाजार में स्थापित किया, इसके साथ ही विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना और बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार-संबंधित पहलुओं (TRIPS) पर अंतरराष्ट्रीय समझौते ने पेटेंट कानूनों के वैश्वीकरण को जन्म दिया। यह एक ऐसा दौर था जब सैन्य साम्राज्यवाद का स्थान "जैविक उपनिवेशवाद" (Biological Colonization) ने ले लिया था। इसका तात्पर्य यह था कि विकसित देशों की विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अपनी सशक्त शोध एवं विकास (R&D) सुविधाओं और कानूनी ताकत के बल पर, विकासशील राष्ट्रों के प्रचुर जैविक संसाधनों तथा पीढ़ियों से संचित पारंपरिक ज्ञान का दोहन करने लगी थीं। वे "ग्रीन गोल्ड" (Green Gold) की तलाश में भारत जैसे जैव-विविधता से समृद्ध देशों के संसाधनों का पेटेंट कराकर वैश्विक एकाधिकार स्थापित करने का दुस्साहस कर रही थीं। इस संरचनात्मक असमानता का लाभ उठाते हुए, विदेशी संस्थाओं ने उन औषधियों, बीजों और कृषि उत्पादों पर बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) का दावा करना शुरू कर दिया, जो भारतीय उपमहाद्वीप में सदियों से सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) का हिस्सा थे। इस गंभीर संकट के समय में भारत को एक ऐसे वैज्ञानिक और दूरदर्शी नेतृत्व की अत्यंत आवश्यकता थी, जो अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र, बौद्धिक संपदा अधिकारों की जटिलताओं और आधुनिक विज्ञान तीनों की गहरी समझ रखता हो。

डॉ. मसहेलकर कौन हैं? उनका पृष्ठभूमि और योगदान

डॉ. रघुनाथ अनंत मसहेलकर (जिन्हें रमेश मसहेलकर के नाम से भी जाना जाता है) मात्र एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के बौद्धिक जागरण के एक जीवंत प्रतीक हैं। उनका जन्म 1 जनवरी 1943 को तत्कालीन पुर्तगाली भारत के गोवा स्थित माशेल (Marcel) गाँव में हुआ था। उनके जीवन का प्रारंभिक चरण अत्यंत संघर्षपूर्ण और अभावों से भरा रहा।मात्र छह वर्ष की अल्पायु में उनके पिता का निधन हो गया, जिसके पश्चात उनकी अशिक्षित परंतु दूरदर्शी माता, स्वर्गीय अंजनी मसहेलकर, आजीविका और अपने पुत्र की बेहतर शिक्षा की तलाश में मुंबई आ गईं। मुंबई की एक चाल (Chawl) में रहते हुए, उन्होंने घोर आर्थिक तंगी का सामना किया। डॉ.मसहेलकर 12 वर्ष की आयु तक नंगे पैर स्कूल जाते थे और दिन में दो वक्त का भोजन जुटाना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर वे मुंबई के चौपाटी इलाके में 'जंजीरा मोटर वर्क्स' के पास सीमेंट की बेंचों पर स्ट्रीट लाइट की रोशनी में और रात 10 बजे के बाद मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर रात 2 बजे तक पढ़ाई किया करते थे।

कक्षा 7 में प्रथम आने के बावजूद, 'यूनियन हाई स्कूल' में प्रवेश के लिए आवश्यक 21 रुपये की फीस जुटाने में उन्हें 21 दिन लग गए; यह बाधा तब पार हुई जब उनकी एक परिचित घरेलू सहायिका (Maid) ने अपनी पूरी जमापूंजी उन्हें उधार दे दी। उनके जीवन में बौद्धिक क्रांति का एक बड़ा मोड़ तब आया जब उनके शिक्षक श्री भावे ने उन्हें एक उत्तल लेंस (Convex Lens) के माध्यम से सूर्य की किरणों को केंद्रित कर कागज जलाने का वैज्ञानिक प्रयोग दिखाया। शिक्षक ने समझाया कि यदि ऊर्जा को केंद्रित किया जाए, तो विश्व में कुछ भी हासिल किया जा सकता है। इस घटना ने उनके भीतर एक महान वैज्ञानिक बनने की बीज बो दिए। 'सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट' से प्रतिमाह 60 रुपये की छात्रवृत्ति प्राप्त कर, डॉ. मसहेलकर ने मुंबई के प्रतिष्ठित 'यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी' (UDCT) से 1966 में केमिकल इंजीनियरिंग में स्नातक और 1969 में मात्र तीन वर्षों के भीतर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। ब्रिटेन के सैलफोर्ड विश्वविद्यालय (University of Salford) में अध्यापन और अमेरिका के डेलावेयर विश्वविद्यालय (University of Delaware) में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य करने के पश्चात, वे भारत लौट आए और 1976 में 'राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला' (NCL) से जुड़ गए, जहाँ वे 1989 में इसके निदेशक बने。

वर्ष 1995 में, डॉ. मसहेलकर 'वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद' (CSIR) के महानिदेशक बने; उनके नेतृत्व में CSIR ने एक ऐतिहासिक परिवर्तन का अनुभव किया; उन्होंने भारतीय प्रयोगशालाओं की कार्यसंस्कृति को पारंपरिक "Publish or Perish" (प्रकाशित करो या नष्ट हो जाओ) से बदलकर "Patent, Publish, and Prosper" (पेटेंट करो, प्रकाशित करो और समृद्ध बनो) के नए और व्यावहारिक प्रतिमान में रूपांतरित कर दिया। भारत सरकार ने राष्ट्र-निर्माण में उनके अभूतपूर्व योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें पद्म श्री (1991), पद्म भूषण (2000) और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (2014) से सम्मानित किया。

बासमती चावल पेटेंट विवादः राइसटेक कंपनी की चाल और मसहेलकर की प्रतिक्रिया

जैविक उपनिवेशवाद और बायोपायरेसी (Biopiracy) का सबसे ज्वलंत और दुस्साहसिक उदाहरण 1997 में सामने आया। टेक्सास, अमेरिका स्थित एक बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनी 'राइसटेक इंक.' (Rice Tec Inc.) ने बासमती चावल की कथित नई किस्मों के विकास का दावा करते हुए अमेरिकी पेटेंट कार्यालय (USPTO) से एक व्यापक पेटेंट (पेटेंट नंबर 5,663,484) हासिल कर लिया। बासमती, जो अपनी विशिष्ट सुगंध, लंबे दानों और पकाने के बाद की बनावट के लिए विश्व विख्यात है, सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप - विशेषकर हिमालय की तलहटी और पंजाब क्षेत्र के किसानों द्वारा उगाई जा रही है। राइसटेक ने कुटिलतापूर्वक अमेरिकी लंबी किस्म के चावल (American long-grain rice) के साथ प्रामाणिक बासमती का क्रॉस-ब्रीडिंग (Cross-breeding) कराकर "टेक्समती" (Texmati), "कासमती" (Kasmati) और "जासमती" (Jasmati) जैसी संकर किस्में विकसित कीं और यह दावा किया कि उन्होंने एक पूरी तरह से नवीन और बेहतर कृषि उत्पाद का आविष्कार किया है。

यह पेटेंट भारत की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए एक सीधा और गंभीर खतरा था। यदि यह पेटेंट अबाधित रहता, तो यह उत्तर अमेरिका में बासमती के उत्पादन और विपणन पर राइसटेक का पूर्ण एकाधिकार स्थापित कर देता, जिससे भारत के लगभग 600,000 टन बासमती निर्यात को अपूरणीय क्षति पहुँचती। इस पेटेंट का सबसे खतरनाक पहलू यह था कि राइसटेक ने पेटेंट दावों में 'बासमती' शब्द का प्रयोग किया था, जो प्रत्यक्ष रूप से भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान की चोरी थी। डॉ. मसहेलकर और CSIR ने इस संकट की गंभीरता को तत्काल पहचाना। उन्होंने भारत सरकार के 'कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण' (APEDA) के साथ समन्वय स्थापित कर इस अन्यायपूर्ण और अवैज्ञानिक पेटेंट को चुनौती देने की एक आक्रामक रणनीति तैयार की। भारत का मुख्य तर्क यह था कि बासमती का गुणधर्म भारतीय भौगोलिक जलवायु की देन है और राइसटेक द्वारा किए गए क्रॉस-ब्रीडिंग प्रयोग किसी भी रूप में "नवीनता" (Novelty) के पेटेंट मापदंड पर खरे नहीं उतरते। इस कूटनीतिक और वैज्ञानिक प्रतिकार के तहत 50,000 से अधिक पन्नों के अकाट्य वैज्ञानिक और ऐतिहासिक साक्ष्य USPTO के समक्ष प्रस्तुत किए गए, जिसके दबाव में अंततः राइसटेक को अपने 20 में से 15 सबसे महत्वपूर्ण दावों को वापस लेने के लिए विवश होना पड़ा。

हल्दी पेटेंट का केसः दादी-नानी का नुस्खा बन गया विदेशी आविष्कार

बायोपायरेसी का एक और भी अधिक स्तब्ध करने वाला प्रयास हल्दी (Turmeric - Curcuma longa) को लेकर किया गया, जिसने भारतीय जनमानस को झकझोर कर रख दिया। 28 दिसंबर 1993 को अमेरिका के मिसिसिपी विश्वविद्यालय के दो शोधकर्ताओं (सुमन के. दास और हरि हर पी. कोहली) ने हल्दी के घाव भरने वाले गुणों (Wound healing properties) को अपना आविष्कार बताते हुए USPTO में पेटेंट आवेदन दाखिल किया। आश्चर्यजनक रूप से, पश्चिमी पेटेंट प्रणाली की अनभिज्ञता के कारण 28 मार्च 1995 को इस आवेदन को पेटेंट (पेटेंट नंबर 5,401,504) के रूप में मंजूरी दे दी गई। इस पेटेंट में विशेष रूप से यह दावा किया गया था कि हल्दी के पाउडर का मौखिक (Oral) और सामयिक (Topical) प्रशासन शल्य चिकित्सा के कटने और अल्सर सहित विभिन्न प्रकार के घावों को तेजी से भरता है। भारत के संदर्भ में यह स्थिति अत्यंत हास्यास्पद परंतु खतरनाक थी। हल्दी का उपयोग भारतीय उपमहाद्वीप के हर घर में पीढ़ियों से एक प्राकृतिक एंटीसेप्टिक, मसाले और औषधि के रूप में होता आ रहा है। जो ज्ञान भारत में हर दादी-नानी का सामान्य घरेलू नुस्खा था, वह हजारों किलोमीटर दूर एक विदेशी प्रयोगशाला में रातों-रात एक "नवीन वैज्ञानिक आविष्कार" घोषित कर दिया गया। डॉ. मसहेलकर ने इसे भारत के राष्ट्रीय गौरव पर सीधा प्रहार माना। 28 अक्टूबर 1996 को, उनके नेतृत्व में CSIR ने USPTO में एक औपचारिक पुनरीक्षण (Re-examination) का अनुरोध प्रस्तुत किया। कानूनी लड़ाई का मुख्य आधार यह सिद्ध करना था कि हल्दी के औषधीय गुण भारत में "पूर्व कला" (Prior Art) का हिस्सा हैं, जिसके कारण इस पेटेंट में "नवीनता" (Novelty) और "गैर-स्पष्टता" (Non-obviousness) का पूर्णतः अभाव है。

जीत कैसे हासिल की गईः प्राचीन ग्रंथों और जेनेटिक फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल

हल्दी पेटेंट को रद्द कराना एक अत्यंत जटिल और अभूतपूर्व चुनौती थी, क्योंकि पश्चिमी पेटेंट प्रणाली मुख्य रूप से केवल अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित और प्रलेखित वैज्ञानिक साक्ष्यों को ही मान्यता देती थी। मौखिक परंपराओं या स्थानीय भाषाओं के ज्ञान को वे अक्सर अमान्य मान लेते थे। डॉ. मसहेलकर की टीम ने इस भाषाई और सांस्कृतिक अवरोध को तोड़ने के लिए एक भगीरथ प्रयास किया। उन्होंने भारत भर के पुस्तकालयों को खंगाला और संस्कृत, उर्दू तथा हिंदी के 32 प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया। इन प्राचीन संदर्भों को अंग्रेजी में अनुवादित कर प्रमाणित किया गया। इसके अतिरिक्त, इस ज्ञान को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सिद्ध करने के लिए 1953 में 'जर्नल ऑफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन' में प्रकाशित एक शोध पत्र भी साक्ष्य के रूप में संलग्न किया गया। इन अकाट्य ऐतिहासिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों के भार तले USPTO को झुकना पड़ा, और 20 नवंबर 1997 को हल्दी के उपयोग पर दिया गया पेटेंट पूर्णतः रद्द कर दिया गया। यह इतिहास में पहली बार था जब किसी विकासशील देश ने अमेरिका में अपने पारंपरिक ज्ञान के आधार पर किसी पेटेंट को सफलतापूर्वक चुनौती देकर उसे निरस्त कराया था。

बासमती के मामले में, ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ-साथ आधुनिक जीनोमिक्स और जेनेटिक फिंगरप्रिंटिंग (DNA Fingerprinting) का सहारा लिया गया। चूंकि राइसटेक ने आनुवंशिक सुधार का दावा किया था, इसलिए भारत ने यह सिद्ध करने के लिए अत्याधुनिक डीएनए विश्लेषण का उपयोग किया कि भारतीय बासमती की आनुवंशिक संरचना विशिष्ट है। यूरोफिन्स (Eurofins) जैसी प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित डीएनए मार्कर तकनीक - विशेष रूप से 15-SSR (Simple Sequence Repeats) मार्कर्स और सुगंध के लिए जिम्मेदार 'fgr' जीन के पॉलीमॉर्फिज्म का विश्लेषण करके यह निर्विवाद रूप से सिद्ध किया गया कि राइसटेक का चावल प्रामाणिक बासमती के आनुवंशिक गुणों का मात्र एक कृत्रिम अनुकरण है, न कि कोई मौलिक आविष्कार। डीएनए फिंगरप्रिंटिंग ने यह वैज्ञानिक रूप से स्थापित कर दिया कि बासमती के आनुवंशिक गुण भारतीय उपमहाद्वीप के दीर्घकालिक कृषि इतिहास और विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों की उपज हैं。

TKDL (Traditional Knowledge Digital Library) की अवधारणा और निर्माण

हल्दी, बासमती और बाद में नीम के पेटेंट मुकदमों में मिली ऐतिहासिक जीतों के बावजूद, डॉ. मसहेलकर जैसे दूरदर्शी वैज्ञानिक ने महसूस किया कि हर गलत पेटेंट से लड़ने के लिए करोड़ों रुपये का भुगतान करना और वर्षों का समय व्यतीत करना विकासशील राष्ट्रों के लिए व्यावहारिक और टिकाऊ रणनीति नहीं है। प्रत्येक बायोपायरेसी के प्रयास पर प्रतिक्रियावादी (Reactive) रुख अपनाने के बजाय, भारत को एक सक्रिय (Proactive) सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता थी। इसी रणनीतिक सोच ने 'ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी' (TKDL) की क्रांतिकारी अवधारणा को जन्म दिया। वर्ष 2001 में, भारत सरकार के 'वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद' (CSIR) और तत्कालीन ISM&H विभाग (जिसे अब आयुष मंत्रालय कहा जाता है) के संयुक्त तत्वावधान में TKDL परियोजना का शुभारंभ किया गया। इसका प्राथमिक और सर्वोपरि उद्देश्य भारत के आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धतियों और योग से जुड़े विशाल पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के माध्यम से डिजिटाइज़ करना था। यह मात्र एक डेटाबेस नहीं था, बल्कि एक ऐसा पुल था जो भारत के प्राचीन ज्ञान को अंतरराष्ट्रीय पेटेंट परीक्षकों की समझ योग्य भाषा और प्रारूप में प्रस्तुत कर सकता था, ताकि भविष्य में इस ज्ञान को "पूर्व कला" (Prior Art) के रूप में आसानी से खोजा जा सके。

TKDL का आज का प्रभाव: USPTO, EPO और अन्य पेटेंट कार्यालयों के साथ समझौते

आज, TKDL 34 मिलियन (3.4 करोड़) से अधिक पृष्ठों का एक विशाल और अभेद्य डिजिटल डेटाबेस बन चुका है, जिसमें भारतीय पारंपरिक प्रणालियों के 4.54 लाख (454,000) से अधिक औषधीय फॉर्मूलेशन ट्रांसक्राइब किए गए हैं। भारत ने बौद्धिक संपदा कूटनीति में एक रणनीतिक और निर्णायक कदम उठाते हुए 'नॉन-डिस्क्लोज़र एक्सेस एग्रीमेंट' (TKDL Access Agreement) के माध्यम से यूरोपीय पेटेंट कार्यालय (EPO), USPTO (अमेरिका), JPO (जापान), UKPTO (ब्रिटेन), कनाडाई बौद्धिक संपदा कार्यालय (CIPO) और IP Australia सहित विश्व के प्रमुख पेटेंट कार्यालयों को इस डेटाबेस तक पहुँच प्रदान की है। इस समझौते के तहत, विदेशी पेटेंट परीक्षक TKDL का उपयोग केवल पेटेंट पूर्व-कला खोज (Search) और परीक्षण के लिए कर सकते हैं, जिससे इस ज्ञान की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित होती है। जुलाई 2009 से अगस्त 2014 के बीच की अवधि के आंकड़ों के अनुसार, TKDL टीम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 1,155 पेटेंट आवेदनों की पहचान की जो भारतीय ज्ञान पर आधारित थे। इनमें से 1,120 से अधिक मामलों में पूर्व-अनुदान (Pre-grant) विरोध दर्ज कराया गया, जिसके परिणामस्वरूप 206 से अधिक पेटेंट आवेदनों को पेटेंट परीक्षकों द्वारा रद्द, वापस या दावों को संशोधित करने के लिए मजबूर किया गया। हाल के और भी अद्यतन आंकड़ों के अनुसार, विश्व स्तर पर लगभग 370 पेटेंट आवेदनों को TKDL के पुख्ता साक्ष्यों के आधार पर खारिज या संशोधित किया जा चुका है。

निष्कर्षः क्यों मसहेलकर को भारत रत्न मिलना चाहिए

डॉ. आर.ए. मसहेलकर का जीवन और कार्य केवल विज्ञान की प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा; उन्होंने अपने ज्ञान और नेतृत्व से एक पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक, आर्थिक और बौद्धिक धरोहर की रक्षा की है। "गांधीवादी इंजीनियरिंग" (Gandhian Engineering - 'कम संसाधनों में अधिक का निर्माण') और "समावेशी नवाचार" (Inclusive Innovation) के उनके सिद्धांतों ने भारत के R&D परिदृश्य को नया आकार दिया है और समाज के सबसे निचले तबके तक तकनीक का लाभ पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया है। जिस वैज्ञानिक ने अपनी कुशाग्र बुद्धि से देश को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जैविक उपनिवेशवाद का शिकार होने से बचाया और विश्व को TKDL जैसा स्केलेबल और अजेय मॉडल प्रदान किया, उनका यह राष्ट्र-निर्माण का कार्य उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, 'भारत रत्न', का निर्विवाद रूप से सबसे प्रबल दावेदार बनाता है。

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