TKDL भारत का डिजिटल शील्डः पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा कैसे की गई
समस्या क्या थीः पश्चिमी पेटेंट अधिकारी संस्कृत/तामिल/फारसी नहीं पढ़ सकते थे
अंतरराष्ट्रीय पेटेंट व्यवस्था का एक मूलभूत नियम है: पेटेंट केवल उसी आविष्कार को प्रदान किया जा सकता है जो 'नया' हो और जिसका पूर्व में साहित्य या सार्वजनिक डोमेन में कोई उल्लेख (Prior Art) न हो। मुख्य समस्या यह थी कि USPTO (अमेरिका) या EPO (यूरोप) के पेटेंट परीक्षक 'प्रायर आर्ट' खोजने के लिए केवल पश्चिमी भाषाओं और उनके अपने डिजिटल डेटाबेस का उपयोग करते थे। उनके पास महर्षि चरक, सुश्रुत, वाग्भट के ग्रंथों या तमिल के प्राचीन सिद्ध साहित्यों को पढ़ने, समझने या खोजने की कोई क्षमता नहीं थी। इस भाषाई अवरोध (Language Barrier) का अनुचित लाभ उठाकर विदेशी कंपनियाँ आसानी से भारतीय जड़ी-बूटियों पर पेटेंट हासिल कर रही थीं, क्योंकि परीक्षकों के पास यह प्रमाणित करने का कोई तरीका नहीं था कि यह ज्ञान भारत में सदियों से मौजूद है।
समाधानः TKDL प्रोजेक्ट की शुरुआत और टीम का गठन
2001 में इस गंभीर प्रणालीगत समस्या के स्थायी समाधान के रूप में 'ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी' (TKDL) का निर्माण शुरू हुआ। यह कोई साधारण सूचना प्रौद्योगिकी (IT) प्रोजेक्ट नहीं था। इसके लिए CSIR और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने एक अत्यंत विशिष्ट बहु-विषयक टीम (Multi-disciplinary Task Force) का गठन किया। इस टीम में ऐसे विशेषज्ञ शामिल थे जिन्हें एक साथ लाना अपने आप में एक चुनौती थीः
- पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के विद्वान (आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, और योग के ज्ञाता)
- बौद्धिक संपदा और पेटेंट परीक्षक (Patent Examiners)
- सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और डेटाबेस प्रबंधन विशेषज्ञ
- वैज्ञानिक और बहुभाषी तकनीकी अधिकारी
आयुर्वेद, योग, सिद्ध और अन्य पारंपरिक ज्ञान का डेटाबेस तैयार करना
इस उच्च प्रशिक्षित टीम ने भारत के प्राचीन श्लोकों और पांडुलिपियों का गहन अध्ययन कर 34 मिलियन (3.4 करोड़) पन्नों की जानकारी को एक व्यवस्थित रूप में वर्गीकृत किया। इस विशाल डेटाबेस में जड़ी-बूटियों के नाम, उनके वानस्पतिक नाम, उनके उपयोग के तरीके, रोगों के प्रकार और निर्माण विधियों को मानकीकृत किया गया। बायोपायरेसी के खतरे केवल औषधियों तक सीमित नहीं थे; विदेशी योग स्टूडियो द्वारा आसनों पर पेटेंट और कॉपीराइट के दावों को देखते हुए, 2008 में लगभग 1500 योग आसनों को भी इसमें जोड़ा गया। हाल ही में, लद्दाख क्षेत्र की प्राचीन सोवा-रिग्पा (Sowa-Rigpa) चिकित्सा पद्धति से जुड़े 70 से अधिक ग्रंथों और उनके फॉर्मूलेशन को भी इस डिजिटल लाइब्रेरी का हिस्सा बनाया गया है।
TKDL का तकनीकी पक्षः श्लोक को कोड फॉर्मेट में बदलना
TKDL की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी सफलता इसकी नवोन्मेषी वर्गीकरण प्रणाली है, जिसे Traditional Knowledge Resource Classification (TKRC) नाम दिया गया है। यह प्रणाली प्राचीन ज्ञान को आधुनिक पेटेंट भाषा में अनुवादित करती है। पूरी तकनीकी प्रक्रिया इस प्रकार काम करती है:
- श्लोकों का डिकोडिंगः विषय विशेषज्ञ संस्कृत, फारसी या तमिल के श्लोक को पढ़ते हैं और उसमें छिपी जड़ी-बूटियों, रोगों के लक्षण और उपचार विधि की पहचान करते हैं।
- मानकीकृत कोडिंग: इन जटिल जानकारियों को TKRC प्रणाली का उपयोग करके एक विशिष्ट कोड में बदला जाता है। उदाहरण के लिए, यदि जानकारी चरक संहिता से ली गई है, तो संदर्भ कोड (Bibliography Code) कुछ इस प्रकार बनाया जाता है: AB1 - Caraka Samhita - Edited & translated by P.V Sharma, Vol.-I।
- अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण: TKRC को WIPO के 'अंतरराष्ट्रीय पेटेंट वर्गीकरण' (International Patent Classification - IPC) के पूरी तरह अनुरूप बनाया गया है। TKDL के प्रयासों के प्रत्यक्ष प्रभाव के कारण, IPC में औषधीय पौधों के वर्गीकरण (IPC कोड A61K 36/00) के तहत 200 से अधिक नए उप-समूह (Sub-groups) जोड़े गए। इस तकनीकी वास्तुकला के कारण, एक जापानी या जर्मन पेटेंट परीक्षक अपनी भाषा में जब "बाल झड़ने के उपचार के लिए हल्दी" के लिए पेटेंट आवेदन खोजता है, तो TKDL डेटाबेस उसे तुरंत बता देता है कि अमुक जड़ी-बूटी का उपयोग भारतीय संहिताओं में पहले से वर्णित है।
| TKDL डेटाबेस की मुख्य विशेषताएं | विवरण |
|---|---|
| प्रलेखित चिकित्सा प्रणालियाँ | आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, योग, सोवा-रिग्पा |
| कुल ट्रांसक्राइब किए गए फॉर्मूलेशन | 4.54 lakh (454,000) से अधिक |
| डिजिटाइज्ड पन्नों की संख्या | लगभग 34 मिलियन (3.4 करोड़) |
| अनुवादित अंतरराष्ट्रीय भाषाएँ | अंग्रेजी, जापानी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश |
| वर्गीकरण प्रणाली (Classification) | TKRC (Traditional Knowledge Resource Classification) |
अंतरराष्ट्रीय समझौते: USPTO और यूरोपीय पेटेंट ऑफिस के साथ लिंकेज
दुनिया का सबसे अच्छा डेटाबेस बनाना आधी लड़ाई थी; पेटेंट कार्यालयों को इसे आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल करने के लिए राजी करना दूसरी बड़ी कूटनीतिक जीत थी। भारत सरकार ने 'नॉन-डिस्क्लोज़र एक्सेस एग्रीमेंट' (Non-disclosure Access Agreement) के तहत यूरोपीय पेटेंट कार्यालय (EPO), USPTO (अमेरिका), JPO (जापान), UKPTO (ब्रिटेन), कनाडाई बौद्धिक संपदा कार्यालय (CIPO) और IP Australia को TKDL तक पहुँच प्रदान की। इस कानूनी समझौते की शर्त यह है कि पेटेंट परीक्षक TKDL का उपयोग केवल पेटेंट खोज (Prior Art Search) और परीक्षण के लिए कर सकते हैं, लेकिन वे इस ज्ञान का वाणिज्यिक दोहन नहीं कर सकते या इसे तीसरे पक्ष को हस्तांतरित नहीं कर सकते।
TKDL की सफलता के आंकड़े और उदाहरण
TKDL की प्रभावशीलता बेजोड़ और स्पष्ट रूप से मापने योग्य है। जहाँ हल्दी के पेटेंट को कानूनी रूप से निरस्त कराने में लाखों डॉलर और कई वर्ष खर्च हुए थे, वहीं TKDL के माध्यम से यह निवारक लागत व्यावहारिक रूप से शून्य (Zero Cost) हो गई है। जुलाई 2009 से अगस्त 2014 तक के प्रमाणित आंकड़ों के अनुसार, TKDL के उपयोग से 206 विदेशी पेटेंट आवेदनों को सफलतापूर्वक वापस लेने, रद्द करने या दावों में संशोधन करने के लिए मजबूर किया गया। हाल के वर्षों (2020-2024) के विस्तार के बाद यह संख्या 370 से अधिक हो चुकी है। एक स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, TKDL के अस्तित्व में आने और EPO से जुड़ने के बाद यूरोपीय पेटेंट कार्यालय (EPO) में भारतीय चिकित्सा प्रणालियों से संबंधित पेटेंट आवेदनों में 44% की भारी और स्पष्ट गिरावट दर्ज की गई है, जो इस प्रणाली के जबरदस्त निवारक (Pre-emptive) प्रभाव को प्रमाणित करता है।
वर्तमान चुनौतियां: योग, फैशन, अन्य क्षेत्रों में मिसएप्रोप्रिएशन
आज बायोपायरेसी और सांस्कृतिक विनियोग (Cultural Appropriation) का स्वरूप निरंतर बदल रहा है। अब केवल दवाओं या कृषि बीजों की चोरी नहीं हो रही, बल्कि योग और भारतीय हस्तशिल्प तथा पारंपरिक फैशन डिज़ाइनों का भी पश्चिमी कॉरपोरेट्स द्वारा विनियोग किया जा रहा है। अमेरिका और यूरोप में कई संस्थाओं ने विशिष्ट योग आसनों और अनुक्रमों (जैसे बिक्रम योग विवाद) पर कॉपीराइट या ट्रेडमार्क लेने का प्रयास किया। भारत ने TKDL के माध्यम से 1500 से अधिक आसनों का प्रलेखन कर ऐसे कई दावों को निरस्त कराया है, जिससे योग की सार्वभौमिक और ओपन सोर्स प्रकृति बनी रहे। इसके अतिरिक्त, एक वैश्विक कॉस्मेटिक कंपनी 'एवेडा' (Aveda) द्वारा 2006 में 'इंडिजीनस' (Indigenous) शब्द को ट्रेडमार्क करने का प्रयास किया गया। इसी प्रकार, वैश्विक लक्जरी ब्रांड 'प्राडा' (Prada) द्वारा उत्तर भारत की पारंपरिक 'जूती' (Jutti) से हुबहू प्रेरित डिजाइन को 1.25 लाख रुपये में बेचने का मामला सामने आया। चूँकि 'जूती' जैसे उत्पादों के पास कोल्हापुरी चप्पल की तरह कोई GI टैग (Geographical Indication) या TKDL जैसा डिज़ाइन डेटाबेस संरक्षण नहीं है, इसलिए मौजूदा अंतरराष्ट्रीय पेटेंट और ट्रेडमार्क कानूनों के तहत ऐसे विनियोग को रोकना अत्यंत कठिन हो जाता है।
भविष्यः और मजबूत GI संरक्षण और डिजिटल लाइब्रेरी का विस्तार
पारंपरिक वस्त्र डिज़ाइनों, कढ़ाई के पैटर्न, और स्थानीय कृषि-पारिस्थितिक ज्ञान की रक्षा के लिए TKDL के सफल मॉडल को अन्य रचनात्मक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में विस्तारित करने की तत्काल आवश्यकता है। राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम (NBA) 2002 और इसके हालिया 2023 के संशोधनों के साथ मिलकर, TKDL भारत के जैविक और सांस्कृतिक संसाधनों को वाणिज्यिक लूट से बचाने के लिए एक अजेय किला बन सकता है, बशर्ते इसका दायरा निरंतर बढ़ाया जाए।
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